शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009

मै और मेरी जिंदगी...

मैं दो कदम चलता और एक पल को रुकता मगर...
इस एक पल मे जिन्दगी मुझसे चार कदम आगे बढ़ जाती...
मैं फिर दो कदम चलता और एक पल को रुकता और...
जिन्दगी फिर मुझसे चार कदम आगे बढ जाती...

यूँ ही जिन्दगी को जीतता देख मैं मुस्कुराता और...
जिन्दगी मेरी मुस्कराहट पर हैरान होती
औ ये सिलसिला यहीं चलता रहता...
फिर एक दिन मुझे हंसता देख एक सितारे ने पूछा...
"तुम हार कर भी मुस्कुराते हो !
क्या तुम्हें दुःख नहीं होता हार का ? "
मैंने कहा...
"मुझे पता हैं एक ऎसी सरहद आयेगी
जहाँ से आगे जिन्दगी चार कदम तो क्या
एक कदम भी आगे ना बढ पायेगी,
तब जिन्दगी मेरा इंतजार करेगी और मैं...
तब भी यूँ ही चलता रुकता, अपनी रफ्तार से, अपनी धुन में वहाँ पहुचुंगा...
एक पल रुक कर, जिन्दगी को देख कर मुस्कुराउंगा....
बीते सफर को एक नजर देख अपने कदम फिर बढाउँगा
उसी पल मैं जिन्दगी से जीत जाऊँगा...
क्यूंकि मैं अपनी हार पर भी मुस्कुराता था और अपनी जीत पर भी...
मगर जिन्दगी अपनी जीत पर भी ना मुस्कुरा पाई थी और ना अपनी हार पर

7 comments:

Vinay 7 फ़रवरी 2009 को 4:05 am बजे  

अच्छी कविता है

Udan Tashtari 7 फ़रवरी 2009 को 9:28 am बजे  

बहुत उम्दा रचना.

Unknown 7 फ़रवरी 2009 को 12:47 pm बजे  

its very meaningful and one of ur best creation.

Unknown 7 फ़रवरी 2009 को 3:53 pm बजे  

धन्यवाद विनय जी और उड़न तश्तरी और पारुल आपलोगों का प्रोत्साहन मेरे लिए उत्साहवर्द्धक है.

प्रताप नारायण सिंह (Pratap Narayan Singh) 7 फ़रवरी 2009 को 4:32 pm बजे  

"मुझे पता हैं एक ऎसी सरहद आयेगी
जहाँ से आगे जिन्दगी चार कदम तो क्या
एक कदम भी आगे ना बढ पायेगी,
तब जिन्दगी मेरा इंतजार करेगी और मैं...
तब भी यूँ ही चलता रुकता, अपनी रफ्तार से, अपनी धुन में वहाँ पहुचुंगा...
खूबसूरत पंक्तियाँ...बेहतरीन रचना.

एक टिप्पणी भेजें

नया क्या लिखा गया है

आपके विचारों का स्वागत है

कंप्यूटर में कोई समस्या है??

link to web designers guide

ProBlogger Template Managed by Abhishek Anand And created by   ©Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP